विरासत-बीकानेर के झझू गांव में बनी छतरियाें की कहानी बता रहे ,संजु पालीवाल अपने अनुभव से......
ये जो छतरियां आप देख रहे हैं ये बीकानेर के झझू गांव की हैं। इन्हें पालीवालों की छतरी कहा जाता है। ऐछतरियां मैने जैसलमेर के गांवों में भी देखी हैं। तो इस बार जब झझू गया तो कुछ तस्वीरें लीं। इन छतरियों के अंदर पत्थर लगे हैं। उन पर कुछ आकृतियां बनी हैं। जब जब पूछा तो ये बताया गया कि ये छतरियां पुराने वक्त में पालीवाल अपने प्रियजनो की याद में बनवाया करते थे। ये एक तरह का स्मृति स्थल है। ये पहले भी मुझे कभी समझ नहीं आया कि क्या लिखा है। पढ़ने की कोशिश की लेकिन पढ़ ना सका। ना भाषा समझ आयी ना लिपि।
AI की मदद से पढ़े गए तथ्य -इस बार चमत्कार हो गया। मैने AI की मदद ली। कई पत्थरों को को एआई की मदद से पढ़ने की कोशिश की। कुछ पढ़ा लेकिन कुछ लिपि साफ ना होने के वजह से एआई भी ना पढ़ सका। वक्त के साथ सब कुछ धुंधला हो गया है। लेकिन एक पत्थर उसने तकरीबन पूरा पढ़ लिया। अब जो उसे पढ़ा और बताया तो मैं हैरान रह गया.। एआई को मैने छतरी में लगे एख पत्थर का क्लोज़ अब दिया था। उससे कहा था कि ये बीकानेर के झझू गांव में पालीवालों की छतरी पर लगा एक पत्थर है। इसे पढ़े और बताये कि क्या लिखा है.. एआई ने जो जवाब दिया है आप उसे हूबहू पढ़िये.. मैं एडिट नहीं कर रहा हूं। इस ऐतिहासिक शोध ग्रंथ (जैसे 'जूनी ख्यात' में प्रकाशित झझू गांव के पुरातात्विक सर्वेक्षण) के अनुसार, यह बीकानेर के महाराजा रायसिंह जी के समय का सती स्मारक/देवाली शिलालेख है। अक्षरों को स्पष्ट रूप से पढ़ने पर इस शिलालेख का मूल विवरण इस प्रकार है -
मूल (लिप्यंतरण): "॥ श्री गणेशाय नमः ॥" अथ सम्वत्सरेस्मिन नृपति श्री विक्रमादित्य राज्यत् सम्वत् १६६७ वरषे फागुण सुदि ६... व्रा. घोड़ (गौड़) गोत्रे भोजराज सहगमन महासती जेतुंग... ...श्री देवलोके प्राणः ॥" सरल हिंदी अनुवाद एवं अर्थ: 1. समय/तिथि (पहली व दूसरी पंक्ति): * विक्रम संवत 1667 (ईस्वी सन् 1610-1611) के फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष षष्ठी (सुदि 6) को यह उत्कीर्ण कराया गया था। * उस समय बीकानेर पर महाराजा रायसिंह जी का शासन था।
2. व्यक्ति व घटना (तीसरी व चौथी पंक्ति): * इस लेख में ब्राह्मणवंशीय (गौड़/पालीवाल ब्राह्मण) भोजराज की मृत्यु का उल्लेख है। * उनकी धर्मपत्नी महासती जेतुंग (या जेतुंग देवी) द्वारा अपने पति भोजराज के साथ सहगमन (सती) होने का स्पष्ट वर्णन अंकित है।
3. अंतिम पंक्तियां (पाँचवीं पंक्ति): * अंत में "श्री देवलोके प्राणः" या "देवलोक" लिखा हुआ है, जिसका अर्थ है कि उन्होंने पति के साथ देवलोक गमन किया। इस शिलालेख का ऐतिहासिक महत्व: * ऐतिहासिक प्रमाण: यह बीकानेर क्षेत्र में क्षत्रियों/राजपूतों के अलावा ब्राह्मण समाज (पालीवाल/गौड़) में भी सती प्रथा तथा उनके बलिदान की स्मृति में देवाली/छतरी बनाने के महत्वपूर्ण पुरातात्विक प्रमाणों में से एक है।
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