दिल्ली हाईकोर्ट की, प्रेस की स्वतंत्रता और फर्जी पत्रकारिता को लेकर अहम टिप्पणी
साभार- दिल्ली हाईकोर्ट
नई दिल्ली, 19 जुलाई : दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रेस की स्वतंत्रता और फर्जी पत्रकारिता को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि प्रेस की आजादी लोकतंत्र की आधारशिला है, लेकिन इसका दुरुपयोग किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि डिजिटल और सोशल मीडिया के दौर में मोबाइल फोन और माइक्रोफोन लेकर कोई भी खुद को पत्रकार बताने लगा है, जबकि ऐसे कई लोगों के पास न पत्रकारिता का प्रशिक्षण है और न ही किसी प्रकार की जवाबदेही।
न्यायमूर्ति गिरीश कथपालिया ने कहा कि आज पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा बिना किसी नियमन के संचालित हो रहा है। कुछ स्वयंभू पत्रकार लोगों को डराने, धमकाने और दबाव बनाने का माध्यम बन रहे हैं। ऐसे मामलों में प्रेस की स्वतंत्रता को ढाल नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने कहा कि पत्रकारिता का उद्देश्य जनता तक निष्पक्ष और तथ्यात्मक जानकारी पहुंचाना है, न कि किसी व्यक्ति को परेशान करना या सनसनी फैलाना। यदि कोई व्यक्ति कैमरा और माइक लेकर खुद को पत्रकार घोषित कर देता है, तो इससे मीडिया की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ता है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार और विधायिका से कहा कि अब समय आ गया है कि ऐसा प्रभावी रेगुलेटरी फ्रेमवर्क (नियामक ढांचा) तैयार किया जाए, जिससे वास्तविक और जिम्मेदार पत्रकारिता की स्वतंत्रता पूरी तरह सुरक्षित रहे, लेकिन फर्जी, गैर-जिम्मेदाराना और डराने-धमकाने वाली पत्रकारिता करने वालों की जवाबदेही भी तय हो सके। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। पत्रकारिता के नाम पर किसी को प्रताड़ित करने या कानून हाथ में लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
यह टिप्पणी दिल्ली हाईकोर्ट ने सीमापुरी में दो फ्रीलांस यूट्यूब रिपोर्टरों पर कथित हमले से जुड़े जमानत मामले की सुनवाई के दौरान की। हालांकि अदालत ने आरोपियों को जमानत दे दी, लेकिन अपने आदेश में बदलते मीडिया परिदृश्य और पत्रकारिता में जवाबदेही की आवश्यकता पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां दर्ज कीं।
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