बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच  ने  हज़ारों शिक्षकों को दी राहत, 01 नवंबर, 2005 से पहले नियुक्त शिक्षकों के लिए पुरानी पेंशन योजना लागू

 नागपुर – बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने उन शिक्षकों और नॉन-टीचिंग स्टाफ़ को बड़ी राहत दी है, जिन्हें 1 नवंबर 2005 से पहले नियुक्त होने के बावजूद ग्रांट (अनुदान) मंज़ूरी में देरी के कारण 'पुरानी पेंशन योजना' (Old Pension Scheme) का लाभ नहीं मिल पाया था। बेंच ने यह साफ़ किया कि नियुक्ति की तारीख ही सबसे अहम है और इन कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना लागू करने का आदेश दिया। यह फ़ैसला राज्य भर के हज़ारों कर्मचारियों के लंबे संघर्ष की जीत है।

जस्टिस अनिल पंसारे और जस्टिस रजनीश व्यास की बेंच ने रामाशंकर मिश्रा और अन्य शिक्षकों व स्टाफ़ सदस्यों की याचिकाओं पर यह फ़ैसला सुनाया। कोर्ट ने 1 नवंबर 2005 से पहले नियुक्त उन कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना लागू करने का आदेश दिया, जिन्होंने 'डिफ़ाइंड कंट्रीब्यूटरी पेंशन स्कीम' (DCPS) नहीं चुनी थी। साथ ही, नई कंट्रीब्यूटरी पेंशन स्कीम (DCPS) के तहत उनकी सैलरी से काटी गई रकम को चार हफ़्ते के भीतर वापस करने का भी निर्देश दिया गया।

याचिकाकर्ताओं ने औरंगाबाद बेंच के *दत्तात्रेय बोर्से* मामले में दिए गए फ़ैसले का हवाला दिया। उस फ़ैसले के अनुसार, अगर नियुक्ति कट-ऑफ़ तारीख से पहले हुई है, तो ग्रांट की मंज़ूरी बाद में मिलने पर भी पुरानी पेंशन योजना ही लागू रहती है। इस तर्क को मानते हुए कोर्ट ने राज्य सरकार के दावे को खारिज कर दिया। कोर्ट ने सरकार को यह भी निर्देश दिया कि सैलरी से काटी गई रकम चार हफ़्ते के भीतर वापस की जाए और छह हफ़्ते के भीतर 'जनरल प्रोविडेंट फंड' (GPF) खाते खोले जाएं।

राज्य सरकार ने यह कहते हुए सुनवाई टालने का अनुरोध किया था कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। हालांकि, बेंच ने इस अनुरोध को खारिज कर दिया और कहा कि सुप्रीम कोर्ट का कोई 'स्टे ऑर्डर' (रोक का आदेश) नहीं है। कोर्ट ने यह भी बताया कि औरंगाबाद बेंच पहले ही ऐसे ही तर्कों को खारिज कर चुकी है।